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स्वास्तिक क्लिनिक की हेल्थ थ्योरी क्या कहती है

फिजिकल हेल्थ- छोटे बच्चों में बढ़ रहा फैटी लिवर:बच्चों की फूड हैबिट पर ध्यान दें, पिज्जा, बर्गर, नूडल्स, चिप्स, चॉकलेट न खिलाएं

5-9 साल के बच्चों में से एक तिहाई यानी करीब 33% बच्चों को हाई ट्राइग्लिसराइड्स की समस्या है। आमतौर पर ये समस्या वयस्कों को होती है और मोटे लोगों को अधिक होती है। अब बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो इन बच्चों को भविष्य में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इससे फैटी लिवर, हार्ट डिजीज, डायबिटीज, हाई बीपी जैसी बीमारियां हो सकती हैं। अगर बच्चा बहुत चिप्स, नमकीन खाता है। कोल्ड ड्रिंक पीता है या घंटों तक मोबाइल लेकर बैठा रहता है। तो यह और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। हालांकि, थोड़ी कोशिश करके ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल नॉर्मल किया जा सकता है।

  • ट्राइग्लिसराइड्स क्या है?

ट्राइग्लिसराइड्स शरीर में एक तरह का फैट है। ये खाने में मौजूद फैट, जैसे घी, तेल, मक्खन से आता है। साथ ही, अगर हम ज्यादा कैलोरी वाली चीजें खाते हैं – जैसे चॉकलेट, सोडा या ज्यादा चावल-रोटी तो शरीर इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स में बदलकर स्टोर कर लेता है। ये बाद में एनर्जी के लिए इस्तेमाल होते हैं। अगर ये ज्यादा जमा हो जाएं, तो ब्लड वेसल्स में चिपक जाते हैं, जो दिल की धमनियों को ब्लॉक कर सकते हैं। इससे फैटी लिवर की समस्या हो जाती है।

बच्चों के लिए ट्राइग्लिसराइड्स का नॉर्मल लेवल क्या है?

10 साल से कम उम्र के बच्चों में ये 75 mg/dL से कम होना चाहिए। 10-19 साल के किशोरों में 90 mg/dL से कम होना चाहिए। अगर 10 साल के बच्चे में 100 mg/dL से ज्यादा है तो ये हाई लेवल माना जाता है। ट्राइग्लिसराइड्स लेवल ब्लड टेस्ट से पता चलता है, जो 8-12 घंटे फास्टिंग के बाद किया जाता है।

ट्राइग्लिसराइड्स के रिस्क फैक्टर्स

ट्राइग्लिसराइड्स जेनेटिक और लाइफस्टाइल दोनों कारणों से हाई हो सकता है। बच्चों में मुख्य कारण ओबिसिटी, अनकंट्रोल्ड डायबिटीज, थायरॉइड की समस्या, किडनी या लिवर डिजीज है। डाइट में ज्यादा चीनी, रिफाइंड कार्ब्स और सैचुरेटेड फैट्स बड़ा रोल निभाते हैं। एक्सरसाइज की कमी से भी ये जमा हो सकता है। समय से पहले जन्म या कम वेट वाले बच्चों को ज्यादा रिस्क होता है। फैमिली हिस्ट्री, स्टेरॉयड्स या इन्फेक्शन के कारण भी हो सकता है।

इससे बच्चों का भविष्य कैसे प्रभावित होता है?

बच्चों में हाई ट्राइग्लिसराइड्स उन्हें बचपन में उतना प्रभावित नहीं करता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह खतरनाक होता जाता है। इससे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, स्ट्रोक, टाइप-2 डायबिटीज, हाई बीपी, ओबेसिटी और पेरिफेरल आर्टरी डिजीज का रिस्क बढ़ सकता है। लंबे समय तक रहने पर पैंक्रियाटाइटिस हो सकता है, ये बहुत दर्दनाक होता है और मौत का कारण बन सकता है।

अगर अभी कंट्रोल न किया गया तो 30 साल से कम उम्र में ही बच्चा हार्ट अटैक का शिकार हो सकता है। 5% किशोरों में हाई बीपी भी पाया गया, बड़े शहरों में ये 10% तक है। ये सब मिलकर बच्चों की एक्टिव लाइफ छीन सकता है। हालांकि, जल्दी डाइग्नोज करने से 80% रिस्क कम हो जाता है।

अगर हाई ट्राइग्लिसराइड्स है तो क्या करें?

अगर बच्चे में हाई ट्राइग्लिसराइड्स डाइग्नोज हुआ है तो घबराएं नहीं। ये कंट्रोल हो सकता है। डॉक्टर से एक्शन प्लान बनवाएं। रेगुलर टेस्ट और मॉनिटरिंग करें। यह ध्यान रखें कि इसमें दवाओं से ज्यादा रोल लाइफस्टाइल का है। डाइट में बदलाव करें, चीनी कम दें या बिल्कुल न दें और जंक फूड्स न दें।

कैसे सुधरेगा ट्राइग्लिसराइड्स लेवल?

अगर लाइफस्टाइल सही कर ली तो ये समस्या भी खत्म हो जाएगी। यह देख लिया है कि क्या खाने को नहीं देना है। अब करना क्या है?

खाने में फल-सब्जियां, दलिया और मोटा अनाज ज्यादा शामिल करें। ओमेगा-3 रिच फूड्स जैसे अलसी के बीज दें। रोज 30-60 मिनट खुले मैदान में खेलने दें, साइकिलिंग करवाएं, स्विमिंग करवाएं। टीवी-स्क्रीन टाइम कम करें। ध्यान दें कि वजन कंट्रोल में बना रहे। अगर बच्चा नवजात है अगर प्रीमैच्योर बेबी है तो ब्रेस्ट मिल्क दें, जो नेचुरल फैट बैलेंस करता है।


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