बर्न और एसिड अटैक केस में तुरंत क्या करें What to do immediately in cases of burns and acid attacks

बर्न और एसिड अटैक केस में तुरंत क्या करें

औरतें ज्यादा शायद इसलिए जलती हैं क्योंकि हमारी सोसाइटी में कुछ वर्ग ऐसे हैं जो अभी भी समझते हैं कि औरत आएगी तो दहेज आएगा, दहेज नहीं आएगा तो हम दहेज के लिए उसे जला देंगे।

घरों में बर्निंग का शिकार होने वाली युवतियां हों, ऐसिड अटैक का शिकार होने वाली लड़कियां हों या फिर कोचिंग संस्थानों में बर्निंग की दुर्घटना का शिकार हो रहे बच्चे, सभी कहीं न कहीं समाज की कुरीतियों या फिर सरकार की नाकामियों का परिणाम भुगत रहे हैं। मगर फिर भी किस तरह इन के दर्द को कम किया जा सकता है।

जब  घर में कोई इमरर्जैंसी आ जाए या कोई जल जाए तो हम घबराहट में अकसर सही डिसीजन नहीं ले पाते। ऐसे में क्रिटिकल केयर को समझना हर परिवार के लिए जरूरी हो जाता है।
औपरेशन थिएटर में जो पेशैंट होते हैं उन की सर्जरी करने से पहले उन्हें ऐनेस्थीसिया दी जाती है. उस की स्पैशल 3 साल की पढ़ाई होती है।

उस के बाद सुपर स्पैशलाइजेशन के लिए आईसीयू सलैक्ट करना पड़ता है।

चुनौतियां

‘‘पढ़ते समय फाइनैंशियल चैलेंजेस रहते हैं। ऐसे में कोचिंग लेना मुश्किल होता था। तब मेरे पिताजी किताबें ले कर आते थे जो कभी-कभी सैकंड हैंड भी होती थीं। ये थोड़ी सस्ती मिल जाती थीं या फिर हम कई बार बुक्स फोटो स्टेट कर के भी पढ़ते थे। उस वक्त परिस्थिति ऐसी थी कि अगर पहली बार में सलैक्शन न हो तो मुश्किल हो सकती थी। घर में सब से बड़ी मैं ही थी और परिवार को मेरी फाइनैंशियल सपोर्ट की जरूरत भी थी। लेकिन मेरे पेरैंट्स ने मुझे पूरा सपोर्ट किया और कहा कि कोई बात नहीं। कोई भी नौकरी मत करो बस पढ़ो और ऐग्जाम दो। मैं ने 2 साल पढ़ाई की। उस के बाद मेरा सलैक्शन हुआ। ऐक्चुअली फाइनैंशियल प्रौब्लम के साथ निकलना भी उस समय एक बहुत बड़ी चीज थी। मेरा सलैक्शन गवर्नमैंट हौस्पिटल लेडी हार्डिंग में हुआ जहां पर फीस ज्यादा नहीं है। उस समय कुल 500 रुपए फीस थी।

‘‘महिला डाक्टर होने के नाते भी कुछ चैलेंजेस रहे। जब तक हम पढ़ रहे होते हैं तो सिर्फ हम एक बच्चा होते हैं। लेकिन शादी के बाद महिला बन जाते हैं और फिर बहुत सी रिस्पौंसिबिलिटीज आ जाती हैं। जैसे आप को घर-परिवार देखना होता है, खाना बना या नहीं, आप के पति ने खाना खाया या नहीं, ब्रेकफास्ट में क्या बन रहा है, लंच और डिनर में क्या होगा, यह सब हमें सोचना पड़ता है। सब-कुछ मैनेज करना इतना आसान नहीं होता। बच्चे के बाद तो रिस्पौंसिबिलिटी और बढ़ जाती है। लेकिन थैंकफुली मेरी मदर इन ला और फादर इन ला बहुत अच्छे हैं। उन्होंने मुझे कभी इस बात के लिए फोर्स नहीं किया कि आप तमाम चीजों पर ध्यान रखो।

‘‘मेरे पति का भी बहुत बड़ा रोल है। उन्होंने कभी नहीं बोला कि आप इन चीजों पर ध्यान दो और अपनी नौकरी या पढ़ाई पर ध्यान मत दो। जब मेरी शादी हुई थी तो मैं अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन कर रही थी। थर्ड ईयर स्टार्ट ही हुआ था। तब मुझे सिर्फ एक ही काम दिया गया था और वह था पढ़ना। ऐक्चुअली मैं ने सिर्फ पढ़ाई की है, कोई खानावाना नहीं बनाया।

‘‘उस के बाद भी जब मुझे आईसीयू में स्पैशलिस्ट बनना था तब मेरे सास-ससुर और मेरे पति ने ही मुझे ऐनकरेज किया। उस वक्त मेरा बेटा भी पैदा हो चुका था। तब भी मैं खुद हिचकिचा रही थी कि मेरा बच्चा छोटा है और मेरे को एक न्यू कोर्स करना है। कोर्स में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। दिनरात ड्यूटी होती है, कोई निश्चित टाइम नहीं होता। लेकिन घरवालों ने मुझे ऐनकरेज किया कि बच्चा वे देख लेंगे। तुम अपनी फैलोशिप पूरी करो।’’

बर्न केस में फर्स्ट ऐड

‘‘बर्न केस में सब से कौमन जो होता है वह है तेल गिर गया, तेल का स्प्लैश आ गया या कहीं पर छोटी सी आग लग गई, कड़ाई पलट गई, गरम उबलता हुआ पानी गिर गया, पानी गरम करने वाली रौड को बच्चे ने हाथ लगा दिया वगैरह। जो मोस्ट कौमन गलतियां होती हैं वे ये हैं कि जले पर फटाफट तेल लगा देते हैं या कोई टूथपेस्ट लगा देते हैं। हलदी या फिर घी लगा देते हैं। यह सब गलत है।

‘‘सब से सही होगा कि अगर हाथ या उंगलियां जल गई हैं तो सब से पहले उस के हाथ में बंधी हुई चीज हटाएं। मसलन, किसी ने रिंग पहनी हुई है या टाइट ब्रेसलेट पहना हुआ है तो सब से पहले उसे हटाएं और इमीडिएटली रनिंग वाटर यानी नल के चलते हुए नौर्मल पानी से धोएं। आप को आइस वाटर यूज नहीं करना है. नौर्मल चलते पानी में उस बर्न को धोना चाहिए।

अगर बर्न बहुत ज्यादा या बहुत डीप है या फिर दर्द बहुत ज्यादा है और बहुत मोटे फफोले आ जाएं साथ ही जिस को बर्न हुआ है उस की हाथ के साइज से बड़ा बर्न है तब इमीडिएटली मैडिकल हैल्प लेनी चाहिए। बर्न बढ़ा नहीं है तो केवल पानी डाल कर उसे औब्जर्व करना होता है। वैसे फफोला पड़ना अच्छी बात है। इस का अर्थ यह हुआ कि आप की स्किन रिएक्ट कर रही है। आप की स्किन खुद फाइट कर रही है। वह फफोला अपनेआप बैठ जाएगा उसे फोड़ें नहीं।’’

ऐसिड अटैक के बाद क्या करें

‘‘अगर किसी के ऊपर ऐसिड अटैक होता है तो सब से पहले घाव को नल के चलते पानी से धोना जरूरी है। उस वक्त दवा वगैरह कुछ नहीं लगानी है। ऐसिड अटैक में सब से बड़ी प्रौब्लम यह होती है कि कौंट्रैक्चर बन जाते हैं। स्किन वहां से जल कर टाइट हो जाती है और जिस पोजीशन पर होती है वैसे ही रह जाती है। कौंट्रैक्चर कुछ समय बाद बनते हैं लेकिन ऐसिड जब स्किन के अंदर घुसता है तो अंदर ही अंदर घुसता जाता है। ऐसे में उस ऐसिड को निकालना जरूरी होता है जोकि सिर्फ पानी से धोने से ही निकलेगा।

‘‘याद रखें बर्न या ऐसिड विक्टिम पर पानी ही डालना चाहिए। दूध वगैरह नहीं क्योंकि उन से इन्फैक्शन के चांसेज और बढ़ जाते हैं। पता नहीं होता कि दूध में कौन से कैमिकल हैं। इसलिए जब विक्टिम हौस्पिटल पहुंचे तो पानी से धो कर पहुंचे। फिर डाक्टर को जो सही लगेगा वे करेंगे। याद रखें इस के लिए हमेशा नौर्मल पानी यूज करें। ठंडा आइस कोल्ड वाटर कभी नहीं लें।

‘‘हौस्पिटल में डाक्टर भी सब से पहले पानी से ही साफ करते हैं। उस के बाद उस की ड्रेसिंग करते हैं। ड्रैसिंग मतलब पानी से भीगी पट्टी लगाते हैं ताकि उस में लौसेज न हो। ऐक्चुअली जब बर्न होता है तो हमारी ऊपर की स्किन जल जाती है। स्किन हमारा सब से ज्यादा प्रोटैक्टिव बैरियर है। यह अंदर मसल्स को प्रोटैक्ट करती है। तो जब हमारी प्रोटैक्टिव लेयर ही नहीं है तो हमारा वौल्यूम लौस होता है। हमारी बौडी के अंदर पानी की जो मात्रा होती है वह बहुत लूज करती है। इसलिए उसे कवर कर के रखते हैं गीली पट्टी से ताकि हमारे लौसेज कम हों। लौसेज कम होते हैं तो हमें खूब सारा फ्लूइड देना पड़ता है। इन सब चीजों का आईसीयू में बहुत ध्यान रखना पड़ता है। 70% शरीर पानी से बना है।’’

‘‘नौर्मल पानी से जली हुई जगह को धो कर अच्छे से क्लीन कर के फिर पट्टी बांध 3 दिन रखते हैं। उस के बाद हम ऐंटीबायोटिक स्टार्ट करते हैं। तकलीफ से राहत देने के लिए पेशैंट को पेन किलर जरूर देते हैं। ऐसे मरीज को पेन किलर की रिक्वायरमैंट काफी होती है। कुछ टाइम के बाद यानी एक-डेढ़ महीने में दर्द होना कम हो जाता है और हमारी पेन किलर की जो रिक्वायरमैंट है वह भी कम हो जाती है। अगर ज्यादा बर्न है तो इन्फैक्शन की प्रौब्लम भी हो सकती है क्योंकि जलने से स्किन हट जाती है।

‘‘स्किन बैरियर का काम करती है। बैरियर ही हट गया तो वहां पर इन्फैक्शन के चांसेज बढ़ जाते हैं। अगर इन्हेलेशन केस हो यानी जब कोई आग वाले कमरे में फंस गया, जिस में खूब स्मोक होती है, धुआं होता है तो उस में लंग्स में अंदर तक धुआं चला जाता है। उस टाइम पर हमें इमीडिएटली पेशैंट को वैंटिलेटर पर रखना पड़ता है क्योंकि धुआं अंदर लंग्स तक फंस गया है। इस से पेशैंट को सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे केस में एकमो की जरूरत होती है यानी किसी पेशैंट को वैंटिलेटर से भी आराम नहीं आ रहा होता तो उस में हम एकमो डाल सकते हैं।

ऐसिड बर्न या जलने के बाद मरीज को डिप्रैशन और सैल्फ कौन्फिडैंस की दिक्कत होती है। दवा देने और सर्जरी के बाद हम मरीजों की मैंटल हीलिंग के लिए उस का साइकेट्री रेफरल भी करवाते हैं क्योंकि हमें पता है कि पेशैंट को डिप्रैशन होगा क्योंकि फेस इन्वौल्व होता है और पेशैंट को अपना फेस देख कर इतनी पीड़ा होती है कि वह कह भी नहीं सकता। बार-बार अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे में हम उस की रैग्युलर काउंसलिंग करवाते हैं।’’

क्रिटिकल केयर की फील्ड

‘‘क्रिटिकल केयर काफी इंपौर्टैंट फील्ड है। लोगों की सुरक्षा के लिए जैसे पुलिस होती है और एक होती है आर्मी। क्रिटिकल केयर डाक्टर्स भी एक आर्मी है जो इमीडिएटली फटाफट पेशैंट को अटैंड करती है। पेशैंट अगर बैठे-बैठे गिर गया तो उस समय सब से पहले क्रिटिकल केयर वाले उस को फटाफट वैंटिलेटर पर डालते हैं, उसे स्टेबल करते हैं और इमीडिएटली उसे इलाज देते हैं। यानी आर्मी वाले जो काम होते हैं ऐक्यूट केयर देना वे क्रिटिकल केयर वाले डाक्टर करते हैं।

‘‘पेशैंट की कंडीशन जब बिलकुल खराब होती है तब वह हमारे पास आता है और जब पेशैंट ठीक हो कर घर जाता है तो वह डाक्टरों के लिए बहुत खुशी का पल होता है।’’

आईसीयू में काम और चुनौतियां

‘‘आईसीयू में सब से बड़ी बात यह है कि यहां कोई दिन या रात नहीं होती। आईसीयू 24 घंटे चलता है। उस में हमारे लिए सब से चैलेंजिंग कभी-कभी यह होता है कि हमारी कई नाइट्स लग रही हों। वैसे हम हर हफ्ते 2-3 नाइट ड्यूटी करते हैं। उस में चैलेंजिंग यह होता है कि जब आप बिलकुल थक चुके होते हो, आप को लगता है कि बस अब आराम चाहिए, 10 घंटे हो गए भागतेभागते।

‘‘ऐसे में जैसे ही आराम करने दो मिनट बैठो, उसी वक्त एक और पेशैंट सिक हो गया या नया पेशैंट आ गया तो ऐसे में वापस उठ कर काम करना आसान नहीं होता। मगर इतने सालों में यह आदत हो गई है कि जैसे ही पेशैंट आए, कैसी भी हालत हो, कितने भी थके हों, हमें उठना ही है और फिर से काम पर लग जाना है।

‘‘दूसरी चैलेंजिंग चीज है काम के साथ घर संभालना। एक महिला होने के नाते हमेशा घर की टैंशन रहती है कि बच्चा क्या कर रहा होगा? कभीकभी बच्चे का फोन आता है और हमें बोलना पड़ता है कि अभी मैं बहुत बिजी हूं। थोड़ी देर में बात करेंगे। कई बार बच्चे के ऐग्जाम होते हैं। ऐसे में एक तो हौस्पिटल की टैंशन होती है और दूसरे बच्चे की टैंशन होती है कि उसे ऐग्जाम कराऊं कि यहां पर काम करूं। जल्दी जाने का हमेशा मन करता है लेकिन पेशैंट देखना ज्यादा जरूरी है।

‘‘अब वैसे बच्चा भी समझ गया है। जितनी सपोर्ट मेरे हस्बैंड ने की उतनी शायद और कोई नहीं कर सकता। जब मेरी नाइट ड्यूटी रहती है और बच्चे का ऐग्जाम होता है तो वे बोलते हैं कि मैं पढ़ा देता हूं या मैं देख लेता हूं बच्चे को। बच्चा जब भी रोया तो उन्होंने वीडियो काल करा दी या कभीकभी अस्पताल दूर से दिखा दिया कि मम्मा यहीं हैं।’’

औरतें ज्यादा क्यों जलती हैं

‘‘औरतें ज्यादा शायद इसलिए जलती हैं क्योंकि हमारी सोसाइटी में कुछ वर्ग ऐसे हैं जो अभी भी समझते हैं कि औरत आएगी तो दहेज आएगा, दहेज नहीं आएगा तो हम दहेज के लिए उसे जला देंगे। अभी भी कितने केसेज ऐसे हो रहे हैं जब लड़कियों को सिर्फ जलाया ही नहीं जाता बल्कि मार भी दिया जाता है। समाज की सोच में बदलाव बहुत जरूरी है। आज मैं यहां हूं क्योंकि मेरी फैमिली में मेरे मांबाप या सासससुर या फिर मेरे पति की सोच ऐसी नहीं थी।’’

क्रिटिकल केयर किस के लिए है

‘‘क्रिटिकल केयर में वे ही जाते हैं जो बहुत सिक होते हैं। किसी का अगर बीपी बहुत कम है, सांस लेने में तकलीफ है, छाती में दर्द है या ऐसी तकलीफ है जो कि घर पर मैनेज नहीं हो पा रही है तब आईसीयू की जरूरत होती है। किसी को सीवियर इन्फैक्शन है, इन्फैक्शन कहीं का भी हो सकता है, लंग का हो सकता है, यूरिन का हो सकता है, पेट में इन्फैक्शन हो सकता है।

‘‘ऐसे में जब भी पेशैंट के बीपी, हार्ट रेट में कुछ बदलाव आता है तो भी हमें उसे आईसीयू में एडमिट करना पड़ता है। आईसीयू से डरने की जरूरत नहीं है। हर आईसीयू पेशैंट वैंटिलेटर पर नहीं जाता है। अगर बहुत सिक है, बीपी बहुत कम हो गया है या कुछ और क्रिटिकल कंडीशन है तब कभी-कभी वैंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। यह भी सोचा जाता है कि वैंटिलेटर से मरीज निकलेगा नहीं लेकिन वैंटिलेटर वाले मरीज भी घर जाते हैं।’’

ग्रामीण और छोटे शहरों में क्रिटिकल केयर की कमी

‘‘आईसीयू ग्रामीण एरिया में बहुत कम हैं। हमें वहां के डाक्टर को ट्रेन करना बहुत जरूरी है। वहां पर एक बेसिक फैसिलिटी होनी बहुत जरूरी है जिस से कि हम एटलीस्ट नौर्मल पेशैंट को इमरजैंसी केयर वहां पर दे सकें और उन्हें बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर सकें। वहां शिफ्टिंग की सुविधा और बेसिक मैडिकल एड की जरूरत होती है। हमें कैंप्स लगाने चाहिए और उन पेशैंट्स को जा कर देखना चाहिए। डाक्टर्स को ट्रेन करना चाहिए।’’
डा. मधुर अरोड़ा ‘फोर्टिस मैमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम’ में क्रिटिकल केयर मैडिसिन की सीनियर कंसल्टैंट हैं। एमबीबीएस, एमडी, आईडीसीसीएम की डिगरी के साथ उन के पास क्रिटिकल केयर में 15 साल से ज्यादा का ऐक्सपीरियंस है। उन्हें 2023 में ‘मोस्ट ट्रस्टेड क्रिटिकल केयर मैडिसिन स्पैशलिस्ट इन गुरुग्राम’ के अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। साथ ही वे ईएलएसओ इंडिया की प्रोग्राम कोऔर्डिनेटर भी हैं और देशविदेश में ईसीएमओ (एकमो) व क्रिटिकल केयर पर डाक्टर्स को ट्रेनिंग देती हैं।

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