लिम्फैटिक ड्रेनेज मुक्के, थप्पड़ व लकड़ी के हथौड़े से Lymphatic drainage with punches, slaps, and wooden hammer

 लिम्फैटिक ड्रेनेज:अमेरिका-जापान में यातना भरे ब्यूटी ट्रीटमेंट का ट्रेंड, खर्च 35 हजार रु.; मुक्के, थप्पड़ व लकड़ी के हथौड़े से प्रहार तक झेल रहे

आपने कभी शीशे में खुद को ध्यान से देखा और महसूस किया है कि गाल थोड़े भारी, जबड़ा कम शार्प या आंखें कुछ फूली हैं, तो आप उस जादुई व डरावने शब्द से परिचित हैं... ‘ब्लॉटेड’ (फूला हुआ)। यह सिर्फ शारीरिक अवस्था नहीं है; बल्कि आधुनिक अभिशाप है, जो स्नैक्स, प्रदूषण, कम नींद या उम्र का नतीजा हो सकता है। पर आज की ‘कर्स ऑफ नॉलेज’ (ज्ञान के अभिशाप) वाली दुनिया में, हम इसे नजरअंदाज भी नहीं कर सकते।

यहीं से शुरू होता है अरबों डॉलर का वह साम्राज्य, जो आपके चेहरे को ‘स्लिम’ बनाने व ‘तराशने’ का वादा करता है। इसी उम्मीद में लेखिका एमी वॉन्ग टोक्यो के एक फेस करेक्शन क्लिनिक पहुंचीं। यहां एक प्रक्रिया होती है जिसे ‘कोगाओ क्यूसेई’ कहते हैं...‘छोटे चेहरे का सुधार’। यह सुनने में जितना सौम्य है, हकीकत में उतना ही कष्टदायी। एमी जब उस मेज पर लेटीं, तो उन्हें लगा जैसे कोई आटा गूंथ रहा हो।

चेहरे पर थप्पड़, मुक्के, और यहां तक कि लकड़ी के हथौड़े से प्रहार! यह ब्यूटी ट्रीटमेंट कम और किसी मध्यकालीन यातना जैसा ज्यादा लगा। जब थेरेपिस्ट ने कानों को मुट्ठी में पकड़कर इतना खींचा कि लगा कान निकल ही जाएंगे। अमेरिका में इसे ‘लिम्फैटिक ड्रेनेज’ कहते हैं, जो शरीर के अपशिष्ट तरल पदार्थ को बाहर निकालने की प्रक्रिया है।

एक्सपर्ट कहते हैं,‘चेहरे को सुधारने या साफ’ करने की यह सनक सिर्फ सुंदरता की चाह नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की उन अशुद्धियों-जैसे प्रोसेस्ड फूड व माइक्रोप्लास्टिक्स से खुद को मुक्त करने की छटपटाहट है, जो भीतर से बीमार कर रही है। इससे निजात पाने के लिए अमेरिका, जापान व यूरोप के लोग जेड रोलर, माइक्रोकरंट डिवाइस, वायरल चिन-बैंडेज, फेसजिम जैसे दर्दनाक उपाय अपनाने में हिचक नहीं रहे हैं। इस ट्रीटमेंट का खर्च 20 से 35 हजार रु. तक है। इसका वैश्विक बाजार ₹2.20 लाख करोड़ रुपए का है। यह हर साल 16.7% की रफ्तार से बढ़ रहा है।

एमी बताती हैं... ‘जब ‘पिटाई’ खत्म हुई और आईना सामने आया, तो चेहरा गायब नहीं हुआ था, पर पहले जैसा भी नहीं था। पुरानी सूजन के नीचे से ‘आदर्श चेहरा’ निकल आया था। ऐसा लगा मानो मूर्तिकार ने पत्थर को तराश कर भीतर छिपी मूर्ति निकाल दी हो।’

यह खेल सिर्फ सुंदरता का नहीं, बल्कि ‘नियंत्रण’ का: एक्सपर्ट

एस्थेटिक्स एक्सपर्ट जिया टोलेंटिनो कहती हैं,‘यह खेल सिर्फ सुंदरता का नहीं, बल्कि नियंत्रण का है। दुनिया हमारे नियंत्रण से बाहर है... हवा जहरीली है, तकनीक हमें ट्रैक कर रही है । पर जब हम अपने चेहरे को उंगलियों ‘कुचलवाते’ हैं, तो हमें लगता है कि कम से कम इस चीज पर हमारा काबू है। हम खुद को सजा देते हैं, फिर खुद ही उस सूजन को मिटाकर ‘सुधार’ देते हैं। इस अनिश्चित दुनिया में, वह छोटा, तराशा हुआ चेहरा शायद अंतिम किला है, जहां हम खुद को सुरक्षित व व्यवस्थित महसूस करते हैं।

ये लेख भास्कर से लिया गया है।

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डॉ. के पी कौशिक

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