मनोरोग के क्या है शुरुआती लक्षण What are the early symptoms of mental illness?
यहां जानें, मनोरोग के क्या है शुरुआती लक्षण
शरीर की तरह हमारा मन भी बीमार हो सकता है। शरीर की तरह मन भी लक्षणों के जरिए जता देता है कि उसे कोई तकलीफ है। इन लक्षणों को नजरअंदाज करने से व्यक्ति गंभीर मनोरोग का शिकार हो सकता है।
आजकल ज्यादातर लोग मनोरोगी है। उन्हें उपचार की आवश्यकता है। आमतौर से 30 से 49 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में मनोरोग के लक्षण होते हैं। गांवों की अपेक्षा शहरों में मानसिक रोगी अधिक पाए जाते हैं। अधिकतर इस का कारण गरीबी होता है।
वैसे तो 30 से 49 वर्ष की आयु के बीच रोगियों में मनोरोगों का पाया जाना सामान्य बात है परंतु इन के लक्षण किसी भी आयु के व्यक्ति में हो सकते हैं। डाक्टरी उपचार का मकसद रोगी को समाज व कार्यालय में पुनर्स्थापित करना होता है। दवाएं जीवनभर चलती हैं। दवा के सेवन में कोताही नहीं बरतनी चाहिए। उपचार को बंद करने से रोग की पुनरावृत्ति हो जाती है। दवाएं मनोरोग विशेषज्ञ की सलाह से ही घटानी अथवा बढ़ानी चाहिए।
विशेषज्ञों की मानें तो अधिकतर मामलों में रोगी के परिजन उसे तभी अस्पताल लाते हैं जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है। आखिर हम मानसिक परेशानियों को नकारने की कोशिश क्यों करते हैं? क्या दिमाग हमारे शरीर का हिस्सा नहीं है? यदि रोगियों को शुरुआती दौर में लक्षण पहचान कर अस्पताल लाया जाए तो कम तीव्रता वाली सस्ती दवाओं से ही गुजारा संभव होता है। इस से मरीज पर दवाओं के कम साइड इफैक्ट्स पड़ते हैं।
मानसिक रोगियों के परिजनों का सुख-चैन, खाना-पीना सब हराम हो जाता है। अगर बीमारियां गंभीर हैं, मसलन किसी को अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, व्यक्ति कुछ ऐसा देख या सुन रहा है जो दूसरे नहीं या अगर वह खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है तो ऐसे में परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे उसे डाक्टर के पास ले जाएं क्योंकि ऐसी हालत में मरीज कभी खुद स्वीकार नहीं करेगा कि वह बीमार है।
उस का इलाज सिर्फ थेरैपी या काउंसलिंग से या फिर दवाइयों की जरूरत भी पड़ेगी, इस का फैसला डाक्टर करेगा। ऐसे में सलाह है कि परिवार में घटित घटनाओं के घटने पर उत्पीडि़त व्यक्ति की रोजाना की जिंदगी पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दें। इसे यहां एक तालिका के जरिए दर्शाया जा रहा है।
मनोरोग विशेषज्ञ को सर्वप्रथम रोगी की सामाजिक व आर्थिक स्थिति से वाकिफ होना आवश्यक है।वह समाज के किस खंड का है, उस की शिक्षा व योग्यताएं क्या हैं वगैरह। इस के अलावा यदि उसे यह भी ज्ञात हो कि वह किन लोगों के संपर्क में रहा है व कौन-कौन सी भाषाएं जानता है, तो विशेषज्ञ को, रोगी द्वारा अपना हाल-चाल बताते समय उस ने कौन से शब्द किस प्रकार से कहे हैं, रोग को जांचने में अधिक दिक्कत नहीं होगी।
मसलन, यदि हिंदी भाषी व्यक्ति ऐसा शब्द इस्तेमाल करता है जो किसी दक्षिण भारतीय राज्य की भाषा में भी हो और उस में उस का अर्थ एकदम खास हो तो रोग के प्रकार का निदान भली-भांति हो सकता है। विशेषज्ञ यह भी तय करें कि मरीज किस हद तक असफलता का कारण दूसरों के सिर मढ़ता है। कुछ मरीज ऐसे भी होते हैं जो अपनी असफलता के लिए स्वयं को इतना अधिक जिम्मेदार मानते हैं कि स्वयं को माफ नहीं करते। एक गलत धारणा यह भी है कि डिप्रैशन या दिमागी तकलीफ सिर्फ उसे ही होती है, जिस की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा हादसा हुआ हो या जिस के पास दुखी होने की बड़ी वजहें हों।
डिप्रैशन के दौरान इंसान के शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन जैसे कि औक्सिटोसिन का बनना कम हो जाता है। यही वजह है कि डिप्रैशन में व्यक्ति चाह कर भी खुश नहीं रह पाता। इसे दवाइयों, थेरैपी और लाइफस्टाइल में बदलाव ला कर बेहतर किया जा सकता है।
कोई भी व्यक्ति स्वयं में संपूर्ण नहीं है। स्वयं से प्रतिकार करना ठीक नहीं है। जीवन को पूरा जिएं और परिवार के दायित्वों को भी निभाएं, इसी में खुशियां निहित हैं। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, जानबूझ कर गलत कार्य न करना, नशे व तंबाकू से दूर रहना आदि प्रसन्न रहने के गुर हैं।

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