ड्रग्स से कम नहीं है इंटरनैट का नशा Internet addiction is no less dangerous than drug addiction
ड्रग्स से कम नहीं है इंटरनैट का नशा
इंटरनैट की हद से ज्यादा सर्चिंग ने बहुत सारे घरों की व्यवस्था बिगाड़ दी है। इंटरनैट हमारी सुविधा के लिए है, पर इसके अत्यधिक उपयोग से लोग इंटरनैट की लत के जाल में फंसते जा रहे हैं।
सीमा ने औफिस पहुंच कर अपना पर्स खोला और दराज की चाभी निकालने के लिए जैसे ही अंदर वाली पौकेट में हाथ डाला, उसे अंदर महीन लकड़ी के बुरादे जैसा कुछ होने का एहसास हुआ। उसने झटके से हाथ बाहर निकाला और पर्स उलटा, तो देखा कि तेजपत्ते के कुछ पत्ते किसी ने उसके पर्स में रख दिए थे। उन में से कुछ चूरा हो गए थे। सीमा ने ध्यान से देखा तो उन पत्तों पर लाल स्याही से कुछ नंबर लिखे हुए थे। सीमा आशंकित हो उठी। ये पत्ते कब और किसने मेरे पर्स में रखे? इन नंबरों का क्या मतलब है? किसी ने कोई जादूटोना तो नहीं किया? ऐसे अनेक सवाल उसके जेहन में कौंधने लगे। सारा दिन चिंता में बीता। शाम को घर आई और घरवालों को बताया तो उसकी मां बोली,”अरे, वो तेजपत्ते मैंने रखे थे तेरे पर्स में। तूने फेंक तो नहीं दिए?” “आपने? मगर क्यों? और उन पर नंबर क्यों लिखे थे?” सीमा ने एकसाथ कई सवाल अपनी मां पर दागे। ”अरे,वह मैं फेसबुक पर बाबाजी की रील देखती हूं न। बाबाजी ने बताया कि तेजपत्ते के 5 पत्तों पर वह चमत्कारी नंबर लिख कर अपने पर्स में उस स्थान पर रखो जहां पैसे रखते हैं तो आय में चमत्कारिक रूप से वृद्धि होती है। इसलिए मैंने तेरे पर्स में रखे थे। तूने फेंक दिए क्या?”
”क्या मां, तुम तो यह इंटरनैट देख-देख कर पागल हो गई हो। मेरा 3 हज़ार का पर्स तुम्हारे तेजपत्तों की महक और चूरे से भर गया था। मैं सारा दिन औफिस में परेशान रही, सो अलग। तुम यह इंटरनैट देखना बंद करो। और आगे मेरे पर्स को हाथ मत लगाना।”
सीमा मां पर गुस्सा करती अपने कमरे में चली गई।
बाद में उसके पापा भी बड़ी देर तक उसकी मां को समझाते रहे कि इंटरनैट पर यह बेवकूफी की चीजें मत देखा करो। इंटरनैट देख-देख कर तुमने पूरे घर को मंदिर बना दिया है। पहले एक कोने में तुम्हारे भगवान का मंदिर था, अब पूरे घर में हर दीवार पर तुमने अपने भगवान चिपका दिए हैं।
कहीं कैलेंडर तक लगाने की जगह नहीं छोड़ी। पहले तुम शनिवार को उस मंगते को दो-चार रुपए देती थीं, अब तो हर दिन कोई न कोई झोली फैलाए हमारे दरवाजे पर खड़ा रहता है। इतना दान-पुण्य करने की जरूरत नहीं है। इससे कुछ नहीं होता। यह इंटरनैट पर बैठे बाबा सिर्फ दुनिया को बेवकूफ बनाते हैं। खुद पैसा कमाते हैं और अपने जैसे और निकम्मों के लिए पैसा बनाने का रास्ता तैयार करते हैं।”
सीमा की मां चुपचाप पति की बातें सुनती रही और थोड़ी देर बाद अपने पलंग पर बैठी, फिर अपने स्मार्टफोन के इंटरनैट में डूबी दिखाई दी। दरअसल, वे इंटरनेट एडिक्ट हो चुकी हैं। कोई कितना भी समझाए,फोन और इंटरनैट उनसे नहीं छूटता।
रात के तीन-तीन बजे तक इंटरनैट सर्च करती रहती हैं। घर-परिवार की उन्नति के लिए, धन के आगमन के लिए, जेवर-कपड़े के लिए कोई भी उपाय, कोई भी टोटका कोई बताए, उन्हें वह करना ही होता है।
उनकी इस आदत ने पूरे घर को परेशान कर रखा है। इस एडिक्शन के चलते अब न तो वे सुबह वाक पर जाती हैं, न घर के किसी काम में हाथ बंटाती हैं। बस, नहा-धो कर नाश्ता करके पलंग या कुरसी पर पैर फैला कर पड़ी रहती हैं और फोन में आंखें गड़ाए रखती हैं। फिर उन्हें दीन-दुनिया का कोई होश नहीं रहता। दरवाजे पर घंटी बज रही है, तो बजती रहे। कोई आ रहा है, कोई जा रहा है, उनसे कोई मतलब नहीं। बस,वे और उनका फोन।
मेहताजी की पत्नी का देहांत हुए 8 साल हो गए। मेहताजी अपने बेटे आशीष के साथ रहते हैं। आशीष नौकरी-पेशा है। मेहताजी रिटायर हो चुके हैं। पहले मेहताजी के पास साधारण मोबाइल फोन था जिसमें इंटरनैट नहीं था। कोई 3 साल पहले आशीष ने उनको एलजी का बढ़िया स्मार्टफोन खरीद कर दिया, जिसमें इंटरनैट, कैमरा, वौयस रिकौर्डर सब है।
आशीष ने जीमेल पर उनका अकाउंट खोल कर उनके फोन में व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम सब डाउनलोड कर दिए और चलाना भी सिखा दिया। अब तो मेहताजी को नया काम मिल गया जिसमें वे सुबह से शाम तक डूबे रहते।
बड़ी जल्दी उन्होंने अपने ढेरों फेसबुक फ्रैंड्स बना लिए। खूब मैसेज का आदान-प्रदान होता और खूब फोटो शेयर होने लगे। यूट्यूब देखने का चस्का लगा, तो दुनियाभर के वायरल वीडियो देख-देख कर दोस्तों से शेयर करने लगे।
पत्नी की मृत्यु के बाद से मेहताजी अपना और बेटे का खाना खुद ही बनाते हैं। उनको कुकिंग का काफी शौक भी है। इंटरनैट हाथ में आया तो कभी-कभी यूट्यूब पर वीडियो देख कर नई-नई रैसिपी भी ट्राई कर लेते हैं। मगर सोशल मीडिया पर हर वक़्त ऐक्टिव रहने का असर अब उनके दिमाग पर पड़ने लगा है। वे बातें भूलने लगे हैं। कौन सी बात आज हुई, कौन सी कल हुई थी या एक हफ्ते पहले हुई थी, वे सब गड्डमड्ड कर जाते हैं।
फोन के इतने एडिक्ट हो चुके हैं कि कई बार आशीष के औफिस जाने के बाद घर का दरवाजा तक लौक करना भूल जाते हैं। कभी चूल्हे पर दाल या दूध चढ़ाया और आकर यूट्यूब देखने में व्यस्त हो गए तो दाल या दूध उबल कर गिर जाता है। चूल्हा बुझ जाता है मगर गैस चलती रहती है। ऐसा एक-दो बार नहीं, कई बार हो चुका है। कई बार तो रात में जब आशीष घर पर होता है तब भी वे चूल्हे पर भोजन चढ़ा कर भूल जाते हैं।
आशीष कई बार टोक चुका है कि पापा, इतना फोन में मत खो जाओ कि आस-पास क्या हो रहा है, कुछ सुध ही न रहे। मगर मेहताजी मानते नहीं। फोन उनकी जान है। किचन हो, बाथरूम हो, हर जगह उनके हाथ में होता है। इसके चक्कर में मेहताजी ने आस-पास दोस्तों-यारों से मिलना-मिलाना भी छोड़ दिया है।
पहले सब्जी-भाजी लेने मार्केट चले जाते थे, अच्छी वाक हो जाती थी मगर अब इंटरनैट में ऐसे डूबे हैं कि कोई सब्जी वाला घर के नीचे आ जाए, तो खरीद लेते हैं वरना आशीष को फोन करके कह देते हैं कि लौटते समय लेता आए।
आशीष को इससे बहुत झुंझलाहट होती है। कई बार उसकी कार दिल्ली के जाम में फंसी होती है और पापा का फोन आता है कि भिंडी लेता आए तो वह मारे गुस्से के चीख पड़ता है। अब कार लेकर मैं सब्जी-मंडी जाऊं? आपका दिमाग खराब है क्या? दिन में क्यों नहीं ले आए? वह अपने पापा पर चिल्लाता है।
इंटरनैट की हद से ज्यादा सर्चिंग ने बहुत सारे घरों की व्यवस्था बिगाड़ दी है। इंटरनैट हमारी सुविधा के लिए है, पर उसके अत्यधिक उपयोग से लोग इंटरनैट की लत के जाल में फंसते जा रहे हैं।
हालत यह हो गई है कि डाटा न मिलने पर इंटरनैट की लत में पड़ा व्यक्ति परेशान हो जाता है और गुस्सा प्रकट करता है। आजकल जिस तादाद में अस्पतालों में मानसिक रोगी आ रहे हैं उनमें से अधिकांश इंटरनैट के लती हैं और उसके कारण ही उनमें दिमागी असंतुलन पैदा हो रहा है।
डाक्टर कहते हैं कि शराब या ड्रग्स जैसे नशे के एडिक्शन से इंसानी दिमाग में जो बदलाव होते हैं, ठीक वैसे ही बदलाव इंटरनैट की लत ने करने शुरू कर दिए हैं। यह चौंकाने वाला तथ्य अस्पतालों में पहुंचने वाले इंटरनैट डिसऔर्डर से पीड़ित युवाओं की जांच में सामने आया है।
ऐसे युवाओं की फंक्शनल एमआरआई में पता चला है कि इंटरनैट एडिक्शन दिमाग के उसी हिस्से की कार्यशैली को प्रभावित करता है, जिस हिस्से की कार्यशैली ड्रग्स या एलकोहल के एडिक्शन से प्रभावित होती है।
इंटरनैट डिसऔर्डर में फंक्शनल एमआरआई में ब्रेन के अलगअलग हिस्सों की फंक्शनिंग देखी जाती है। जो सामान्य एमआरआई में पता नहीं चलती।
इंटरनैट डिसऔर्डर के शिकार मरीजों की फंक्शनल एमआरआई में ब्रेन का स्ट्राइटल न्यूक्लियस डोपामिनर्जिक सिस्टम प्रभावित देखा गया। यह सिस्टम डोपामाइन हार्मोन रिलीज करता है जो इंसान का मूड नियंत्रित करता है।
इस सिस्टम के प्रभावित होने से एक ही काम बारबार करने का फितूर चढ़ जाता है। जिस तरह नशे का आदी नशे के बिना नहीं रह सकता, ठीक उसी तरह इंटरनैट एडिक्ट इंटरनैट के बिना नहीं रह पाता है। इससे पर्सनल लाइफ, वर्किंग लाइफ और पढ़ाई सभी प्रभावित होने लगते हैं।
जब कोई बच्चा या बड़ा इंटरनैट सर्फिंग का एडिक्ट हो जाता है तो शुरू में घरवाले इसको समझ नहीं पाते हैं। वे सिर्फ उन्हें डांटते हैं कि हर वक्तफोन या लैपटौप में खोए रहते हो, कभी दूसरे काम भी कर लिया करो। उन्हें पता ही नहीं चलता कि वह एक मानसिक बीमारी की चपेट में आ चुका है।
डाक्टर कहते हैं, जब परिवार का कोई सदस्य या आपका बच्चा दिनभर मोबाइल फोन में खोया रहे, पढ़ाई पर बिलकुल ध्यान न दे, डांटने के बावजूद छिप-छिप पर मोबाइल फोन चलाए या बाथरूम में देर तक फोन लेकर बैठा रहे, मोबाइल फोन उससे अलग करें तो चिड़चिड़ा हो जाए, उग्रता दिखाए, गुस्सा करे या चीजें तोड़ने-फोड़ने लगे तो समझ जाना चाहिए कि वह इंटरनैट एडिक्ट हो चुका है।
ऐसा एडिक्ट रातभर जाग कर फोन चलाता रहेगा, उसको खानेपीने की सुध नहीं रहेगी, पढ़ाई में मन नहीं लगेगा, दोस्तयार छूट जाएंगे, खेलने के लिए बाहर नहीं जाएगा, घर का कोई काम नहीं करना चाहेगा।
ऐसी स्थिति में दिमाग के डाक्टर के पास ले जाना ही बेहतर है वरना कंडीशन बिगड़ती चली जाएगी। कभी इंटरनैट कनैक्शन बंद हो जाए या डाटा खत्म हो जाए तो ऐसा लती व्यक्ति बहुत ज्यादा परेशान हो उठता है। जब व्यक्ति इंटरनैट के बिना असहज महसूस करे तथा डाटा न मिलने पर उसका मूड प्रभावित हो जाए, ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति को इंटरनैट की लत है।
इंटरनैट की लत व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कहीं काल्पनिक दुनिया में ले जाती है। इंटरनैट का उपयोग आज हम व्यापक रूप में कर रहे हैं. हमारे सभी जरूरी कार्य, जैसे फौर्म भरना, विभिन्न तरह के रजिस्ट्रेशन, मनोरंजन सभी इंटरनैट के माध्यम से होते हैं। इस वजह से ज्यादातर लोग इंटरनैट की लत का शिकार होते चले जा रहे हैं।
इंटरनैट की लत ने तबाह किया जीवन
इंटरनैट हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्व में सूचनाओं के आदानप्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इंटरनैट की संरचना की गई। इंटरनैट पर सामग्री की भरमार है। इंटरनैट के आने से पूर्व तक हमें हमारा काम करने के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते थे।
इंटरनैट की मदद से आज हम घर बैठे अनेक कार्य कर सकते हैं। इंटरनैट मनोरंजन का बहुत बड़ा माध्यम है। इस वजह से 10 में से 6 लोगों को आज इंटरनैट की लत पड़ गई है। इंटरनैट पर धर्म का धंधा खूब चल रहा है। इंटरनैट पर पोर्न साइट देखने का चस्का शहर से लेकर गांव तक के लोगों को है। छोटे-छोटे बच्चे तक आज मां-बाप की नजर बचा कर अपने फोन पर पोर्न देख रहे हैं। कई नेता-विधायक तो सदन में बैठ कर सदन की कार्रवाई के दौरान पोर्न देखते पकड़े जा चुके हैं। होस्टल या घरों में अधिकांश युवा रातों को पोर्न साइट देखने के आदी हैं। इसमें लड़कियां भी पीछे नहीं हैं।
आज इंटरनैट पर अच्छी बातों का प्रसार कम, गलत बातों का ज्यादा हो रहा है। नेता धर्म के नाम पर जनता को लड़ाने के लिए इंटरनैट का इस्तेमाल कर रहे हैं। धार्मिक भावनाएं उकसानी हों, कहीं भीड़ इकट्ठी करनी हो, दंगा करवाना हो, जुलूस निकलवाना हो, धरना-प्रदर्शन-आंदोलन करवाना हो तो आज इंटरनैट सूचना फैलाने का सबसे सुगम माध्यम बन चुका है।
हर तरह के फ्रौड आजकल इंटरनैट पर हो रहे हैं। फेसबुक,व्हाट्सऐप पर युवाओं के बीच प्रेमलीलाएं चल रही हैं। लोग एकदूसरे को इमोशनल बेवकूफ बना रहे हैं, ठग रहे हैं, आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
इंटरनैट साइबर ठगों का अड्डा बन चुका है। एक क्लिक में आपका पूरा बैंक अकाउंट खाली हो सकता है। 21वीं सदी के टैक्नोलौजी युग में आपका डेटा सुरक्षित नहीं है। पासवर्ड लगा होने के बाद भी आपके मोबाइल फोन से आपका डाटा उड़ा लिया जाता है। डिजिटल इंडिया ने लोगों की जिंदगी को कुछ सुगम बनाया है तो उससे अधिक असुरक्षित भी कर दिया है।
इंटरनैट आकर्षण का मूल कारण
इंटरनैट की लत का मुख्य कारण मनोरंजन है। हम इंटरनैट की सहायता से अनेक मूवी देख सकते हैं, गाने सुन सकते हैं तथा सबसे महत्त्वर्ण बात यह कि हम दुनियाभर के लोगों से जुड़ सकते हैं। इंटरनैट पर विभिन्न साइट्स के माध्यम से दोस्त बना पाना इंटरनैट आकर्षण का मुख्य कारण है और यह इंटरनैट की लत के लिए पूर्णरूप से ज़िम्मेदार है।
इंटरनैट की लत पड़ जाने पर हम उठने के साथ डाटा औन करके नोटिफिकेशन देखते हैं तथा सोने तक यही करते हैं। इस की वजह से हम नोमोफोबिया की गिरफ्त में आ सकते हैं।
इंटरनैट के जरूरत से ज्यादा उपयोग करने पर हमारा बहुमूल्य समय नष्ट होता है। यह एक दिन की बात नहीं है। हमारे जीवन के न जाने कितने दिन यों ही इंटरनैट की लत में बरबाद होते चले जाते हैं।
इसके साथ ही हर तरह के लोग इसका उपयोग करते हैं। उन में से कुछ ऐसे हैं जिनके लिए सही-गलत के कोई माने नहीं, पैसे के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। सो, औनलाइन इनका सामना आपसे होने पर ये किसी भी प्रकार से आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं।

Comments
Post a Comment
Also share your review on given link. https://share.google/jVwmjf9NSCTefAXte