एड़ी का दर्द Heel Pain

 महिलाओं में होने वाली प्रमुख तकलीफों में से एक तकलीफ है एड़ी का दर्द। एड़ी हमारे पैर का एक छोटा व महत्वपूर्ण हिस्सा है जो छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनता है जो पीछे की तरफ या नीचे की तरफ स्थित होती है। एड़ी वह हिस्सा है जो जमीन या जूते के इनसोल के साथ सबसे पहले संपर्क बनाता है और इस पर हमारे वजन से कई गुना ज्यादा बल लगता है। एड़ी में दर्द अधिकांश महिलाओं की एक आम शिकायत है, जिसमें एड़ी की हड्डी में तेज दर्द उठता है और चाहे इसकी गंभीरता कितनी भी हो, यह बहुत परेशान करनेवाला और सीमित करनेवाला हो सकता है। एड़ी के दर्द की वजह से खड़े होने या चलने में दिक्कत आती है। एड़ी में होने वाला दर्द रोगी व्यक्ति को बैचेन कर देता है। पैरों के द्वारा ही चलना, घूमना, दौड़ना, खड़े होना, सीढ़ियां चढ़ना आदि क्रियाएं होती है। यदि एड़ी में दर्द है तो उपरोक्त क्रियाएं कष्टकारक हो जाती है। एड़ी में दर्द को आयुर्वेद में पर्ष्णिशूल तथा आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में प्लांटर फेसिटिस (Planter Fascitis) कहा जाता है


महिलाओं में एड़ी में दर्द कई कारणों से हो सकता है:- ज्यादातर महिलाओं में गलत या ऊंची हील की फुटवियर या सैन्डिल पहनने से एड़ी में दर्द की शिकायत रहती है। गलत या ऊंची हील की फुटवियर पहनने से एड़ी पर अत्यधिक दबाव पड़ने, और ऊबड़-खाबड़ जमीन पर नंगे पैर चलने से एड़ी में दर्द होता है। पैर के निचले हिस्से से एड़ी तक फैले लिगामेंट, प्लान्टर फेशिया, जो ऊतक की एक सपाट पट्टी होती है वो एड़ी की हड्डी को पैर के अंगूठे से जोड़ती है, में सूजन या क्षति जिसे प्लांटर फेसिटिस कहते हैं, के कारण एड़ी में दर्द होता है। यह आमतौर पर ऊंची एड़ी के सेन्डिल या जूतें पहनने से प्लान्टर फेशिया में ज्यादा खिंचाव के कारण होता है। हील स्पर जो एड़ी की हड्डी की अनावश्यक वृद्धि ,एक हुक जैसी रचना है, के कारण एड़ी में दर्द होता है। हील स्पर प्लांटर फैसिटिस के कारण होने वाले तनाव और सूजन की प्रतिक्रिया के रूप में हो सकते हैं। रूमेटाइड गठिया के कारण एड़ी में दर्द होता है। इस में प्रतिरक्षा प्रणाली जोड़ों पर हमला करती है। इससे पैर और टखने में सूजन और कोमलता हो जाती है। यूरीक एसिड के बढ़ने से एड़ी में दर्द होता है, जो गाउट कहलाता है। अन्य कारणों में वातवर्धक आहार का अधिक सेवन, ठंडा मौसम, रात में जागना, पौष्टिक आहार का अभाव आदि का समावेश होता है। ज्यादातर मामलों में एड़ी में दर्द का कारण मधुमेह है। मोटापे के कारण भी एड़ी पर वजन पड़ने से दर्द हो सकता है। 30 वर्ष से अधिक महिलाओं में अक्सर एड़ी में दर्द के लक्षण पाए जाते हैं। चलने और खड़े रहने का गलत तरीका भी एड़ी में दर्द का कारण हो सकता है। गलत फिटिंग वाले जूते, ज्यादा देर तक नंगे पैर चलना, उबड़-खाबड़, या पथरीली जमीन पर बिना चप्पल के घूमना व पत्थर से एड़ी में चोट लगने से भी एड़ी में दर्द होता है।
एड़ी में दर्द के लक्षण:- स्थिति के आधार पर एड़ी का दर्द अलग-अलग तरह से प्रकट होता है। वजन उठाने वाले कामों से दर्द बढ़ जाता है। चलते या दौड़ते समय एड़ी में दर्द का अनुभव हो सकता है। एड़ी में सनसनी, पैर में अकड़न और सीमित गति शीलता , प्रभावित एड़ी में सूजन या लालिमा, तेज दर्द, विशेष रूप से सुबह में या निष्क्रियता की अवधि के बाद दर्द होता है। खड़े होने पर या प्रभावित पैर पर वजन डालने पर एड़ी में दर्द होना। प्लांटर फेसिटिस के रोगियो में सूजन व क्षयजन्य परिवर्तन मिलते हैं। जिससे रोगी को एड़ी में दर्द अधिक होता है। सबसे ज्यादा तकलीफ सुबह उठने के बाद होती है। सुबह-सुबह प्लांटर फेशिया बहुत टाइट होता है। थोड़ा चलने से भी दर्द अधिक होता है। प्लांटर फेशिया को व्यायाम के द्वारा धीरे-धीरे शिथिल करते जाएं, तो दर्द कम हो जाता है परंतु ज्यादा खड़े रहने व चलने से बढ़ जाता है। एड़ी के दर्द से संबंधित रोग उन्हीं को होते हैं, जो ज्यादा खड़े रहते हैं या चलते हैं। सुबह उठने पर या काफी देर बैठकर उठने के बाद पहला कदम जमीन पर रखते ही तीव्र दर्द की अनुभूति होना प्लांटर फेसिटिस का मुख्य लक्षण है। काफी देर आराम करने के बाद अचानक दौड़ना अथवा भारी काम करना, लंबे समय तक खड़ा रहना आदि से एड़ी में इतना अधिक दर्द होता है कि रोगी चलने से कतराता है और एक ही जगह बैठना पसंद करता है। जमीन पर पैर रखना तक मुश्किल हो जाता है।

एड़ी में दर्द से राहत पाने के लिए ये उपाय अपनाए जा सकते हैं:- एक बाल्टी में बर्फ का ठण्डा पानी लेकर उसमें एक मिनट तक एड़ी को डुबाएं, फिर नमक मिले गुनगुने पानी में तीन मिनट तक एड़ी को डुबोएं। ऐसे बारी-बारी से डुबाएं। ऐसा 15 से 20 मिनट तक प्रातःव रात्रि में करने से एड़ी के दर्द में आराम मिलता है। एरोबिक्स तथा तैराकी एड़ी के दर्द को दूर करने में मददगार साबित हो सकती है। एड़ी में चोट लगने पर एड़ी की दस मिनट तक बर्फ से मालिश करनी चाहिए। सुबह उठते ही पिंडलियों (Calf Muscles) को खींचे। इससे एड़ी के दर्द में राहत मिलती है। यह क्रिया दिन में 30 सेंकड के लिए 10 बार करनी चाहिए।

आराम करें और एड़ी में दर्द बढ़ाने वाले कारणों से बचना चाहिए जैसे -सीढ़ियां चढ़ना-उतरना, ज्यादा चलना, पहाड़ों पर चढ़ना, भारी सामान उठाना, उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलना आदि। एड़ी के दर्द से छुटकारा पाने के लिए पौष्टिक आहार लेना चाहिए। शरीर का वजन नियंत्रित रखें क्योंकि बढ़ा हुआ वजन एड़ी पर दबाव डालता है, जो एड़ी के दर्द का कारण बनता है। महिलाएं फ्लैट सेन्डिल या जूते पहनें, हील वाली सेन्डिल या जूते पहनें। घर में पहनने वाली चप्पल में भी हील का प्रयोग न करें। आजकल एड़ी के दर्द को दूर करने के लिए विशेष जूते भी उपलब्ध है। नंगे पाँव बिल्कुल न रहें। रात को सोते समय एड़ी के नीचे तकिया रखकर सोएं। किसी ऊंची जगह पर बैठकर लटकाकर पैरों के पंजों को गोल-गोल कई बार घुमाएं। रोज नमक के गर्म पानी में पैर चलाने की क्रिया करें।



आयुर्वेदिक उपचार:- आयुर्वेद में एड़ी के दर्द के उपचार के लिए कुछ जड़ी बूटियों और औषधियों जैसे चित्रक, रास्ना, अरंडी, सोंठ चूर्ण, अश्वगंधा चूर्ण, अजमोदादि चूर्ण, नरसिहं चूर्ण, योगराज गुग्गुल, सिहंनाद गुग्गुल, त्रिफला गुग्गुल, लाक्षादि गुग्गुल, कांचनार गुग्गुल, श्रृंग भस्म, वातविध्वसंक रस, महारास्नादि काढ़ा एवं दशमलूारिष्ट तथा एरंड तेल, महाविषगर्भ तेल, महानारायण तेल का इस्तेमाल किया जाता है। औषधीय उपचार के साथ पंचकर्म से भी एड़ी के दर्द में आराम मिलता है। एड़ी में दर्द के उपचार की आयर्वेुदिक प्रक्रियाओं में अभ्यंग (तेल मालिश), स्वेदन (पसीना निकालने की विधि), विरेचन (दस्त की विधि), बस्ती (एनिमा), रक्तमोक्षण (खून निकालने की विधि), लेप (प्रभावित हिस्से पर लेप लगाने की विधि ) और अग्नि कर्म (पंचधातु से निर्मित शलाका के द्वारा प्रभावित हिस्से को जलाना) शामिल हैं। उपरोक्त औषधीय तथा प्रक्रियाओं का प्रयोग कुशल आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श अनुसार तथा देखरेख में ही करना चाहिए।



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