ओस्टियोपोरोसिस खामोश बीमारी
ओस्टियोपोरोसिस एक ऐसी खामोश बीमारी है, जो कि धीरे-धीरे शरीर की हड्डियों को कमजोर करने लगती है इसमें हड्डियों की मज्जा घटने लगती है और उनमें मौजूद छोटे-छोटे ऊतक फटने लगते हैं। इस प्रकार हड्डियों में फ्रैक्चर होने का खतरा लगातार बना रहता है। वैसे यह रोग अधिकतर उम्रदराज महिलाओं में पाया जाता है। हालांकि ओस्टियोरोसिस की शुरूआत जीवन में बहुत पहले ही हो जाती है, लेकिन इसके दुष्परिणाम देर से दिखते हैं। इसलिए यह सुझाया जाता है कि हमें शुरू से ही अपने आहार का ध्यान रखते हुए कैल्शियम व विटामिन डी का सेवन अधिक करना चाहिए।
हड्डियों के विरल (थिनिंग) होने को ओस्टियोपोरोसिस कहते हैं हड्डियों के टिश्यू अनवरत नवीनीकृत होते रहते हैं नई हड्डियां पुरानी हड्डियों की जगह लेती रहती हैं 20 वर्ष की उम्र में बोन डेंसिटी शीर्ष पर होती है लेकिन 35 वर्ष की उम्र के बाद हड्डियों का कमजोर होना शुरू होता है। बोन डेंसिटी कई मर्तबा इतने निचले स्तर पर आ जाती है कि जरा सा गिर जाने पर हड्डियां टूट जाती हैं।
शरीर का मूल स्तंभ दोष, धातु, मल है। इनमें से धातु शरीर को धारण करती है ‘‘धारणाद् धातवः’’। ये सात धातुएं है रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र। हम जो आहार नियमित सेवन करते हैं, उस आहार से निर्मित रस के द्वारा ही उत्तरोत्तर धातुएं निर्मित होती है अतः आहार श्रेष्ठ कोटि का होना अत्यंत आवश्यक है। जिन-जिन गुणों से भरपूर आहार का सेवन हम करेंगे वैसे ही धातुओं का निर्माण व पोषण होगा।
आस्टीओपोरोसिस व्याधि में उम्र के अनुसार हड्डियां घिसकर अस्थि की घनता में कमी होकर कमजोरी आती है। अस्थि का कठिन भाग सुषिर होकर हड्डियां खोखली होकर कमजोर हो जाती हैं। जिससे मात्र गिरने या स्वयं ही हड्डी के फ्रैक्चर होने की संभावना रहती है इसमें मुख्यतः कमर व कलाई की हड्डी पर अधिक प्रभाव पड़ता है।
कारण
- बढ़ती उम्र- महिलाओं में 50 वर्ष से अधिक होने पर
- आनुवांशिक
- निष्क्रिय जीवन शैली या व्यायाम कम करना
- कृश (दुबली पतली) और छोटी शरीर रचना
- आहार में कैल्शियम की कमी
- विटामिन ‘डी’, धूप की कमी
- कम उम्र में मासिक धर्म का बंद होना या मेनोपोज
- धूम्रपान
- अधिक मात्रा में मदिरा सेवन
- कुछ बीमारियों मे किडनी, थायरॉइड, हायपर थायराडिसम, लीवर के रोग, कैंसर, आंतो की बीमारियों व गठियावात के रूग्णों को इस रोग का खतरा अधिक होता है। गैस्ट्रिक सर्जरी किए रोगी को ऑस्टियो पोरोसिस का आक्रमण हो सकता है।
- कुछ दवाइयां स्टेराइड, अस्थमा, आर्थराइटिस, एपिलेप्सी की औषधि, नींद की गोलियां, कैन्सर की कुछ दवाइयां और कुछ हारमोन्स।
- माल न्यूट्रिशन (कुपोषण)
- अति डाइटिंग (अतिअल्प आहार)
जीवनशैली से संबंध ?
सक्रिय रहने वाले लोगों की तुलना में ज्यादा वक्त बैठे रहने वाले लोगों में ओस्टियोपोरोसिस का खतरा ज्यादा होता है। पैदल चलना, दौड़ना, कूदना, नाचना, वेटलिफ्टिंग ज्यादा उपयोगी होते है। किसी भी रूप में अल्कोहल और तंबाकू का ज्यादा सेवन ओस्टियोपोरोसिस के खतरे को बढ़ा देता हैं ।
महिलाएं व ऑस्टियोपोरोसिस
ऑस्टियोपोरोसिस और मेनोपॉज में गहरा संबंध होता है। तकरीबन 25-27 वर्ष की उम्र तक सभी हड्डियों का विकास हो जाता है। इस समय हड्डियां सबसे अधिक मजबूत व दृढ़ होती हैं। महिलाओं में हड्डियों के इस स्तर को बरकरार रखने के लिए एस्ट्रोजन नामक हार्मोन का बहुत बड़ा योगदान होता है। एस्ट्रोजन एक ऐसा हार्मोन होता है, जिसका निर्माण ओवरियों के द्वारा किया जाता है जो कि हड्डियों के क्षरण को रोकने में मददगार होता है। मेनोपॉज होने के बाद एस्ट्रोजन के स्तर में कमी आ जाती है और ओस्टियोपोरोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में हार्मोनल थेरेपी की मदद से शरीर में एस्ट्रोजन को रिप्लेस किया जाता हैं, किंतु इस प्रक्रिया में कुछ खतरे जुड़े होते है।
शुरूआती दौर में कोई लक्षण नहीं होते लेकिन ओस्टियोपोरोसिस की समस्या गंभीर होते जाने के बाद पीठ में दर्द के अलावा रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर या अन्य परेशानियां शुरू हो जाती है।
ओस्टियोपोरोसिस की वजह बनने वाले खतरे?
हमारी बढ़ती उम्र सबसे बड़ा खतरा है महिलाओं में रजोनिवृति और पुरूषों में 60 वर्ष की उम्र के बाद ओस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। खासतौर पर अगर अभिभावकों में कोई कूल्हे का फ्रैक्चर झेल चुका हो। कम कद-काठी के पुरूष-महिलाओ पर भी यह खतरा ज्यादा होता है। पुरूषों में टेस्टोस्टेरोन और महिलाओं में इस्ट्रोजेन का स्तर गिरना खतरे को बढ़ा देता है। थाइरॉइड और पेराथाइरॉइड ग्लैंड्स के अलावा एड्रेनाल ग्लैंड का ज्यादा सक्रिय होना भी मुश्किल का सबक बन सकता है। स्टेरॉइड्स, मिर्गी की दवा, गैस्ट्रिक रिफ्लक्स, कैंसर भी ओस्टियोपोरोसिस की वजह बन सकते हैं। किडनी या लीवर की बीमारी, र्यूमेटॉइड आर्थराइटिस और ल्यूपस के मरीजों पर खतरा बढ़ जाता है।
लक्षण
आयुर्वेदानुसार इसे अस्थि सुषिरता कहते है। ओस्टियोपोरोसिस व्याधि से ग्रस्त वृद्धावस्था में स्त्री-पुरूष दोनों हो सकते हैं परंतु महिलाओं में इसका प्रमाण अधिक पाया गया है। बढ़ती आयु में जिन महिलाओं में रजोनिवृत्ति 45 वर्ष से पूर्व ही पाई गई हो, उनमें इस रोग की संभावना अधिक पाई गई है। दरअसल मेनोपाॅस के पहले ईस्ट्रोजन हार्मोन इससे सुरक्षा प्रदान करता है।
मेनोपॉस के बाद या ऑपरेशन से ओवरी (स्त्री बीज कोष) निकाल दी गई हो उस काल में ईस्ट्रोजन स्त्राव न होने से ऑस्टियोपोरोसिस की संभावना रहती है, उनमें भी इस रोग की संभावना होती है। पुरूषों में 50 वर्ष से बढ़ी उम्र के पुरूषों को इससे सचेत रहना चाहिए। शुरूवात में ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षणों का पता नहीं चलता। अतः इसे साइलेन्ट डिसिस कहते हैं। रूग्ण को इस रोग का पता तब चलता है जब हड्डी का फ्रैक्चर होता है। कमर के मनके टूटने से कमर व गर्दन में दर्द होता है। व्यक्ति की ऊंचाई कम होकर कमर में झुकाव आता है। छोटी सी चोट अथवा गिरने से शरीर की कोई भी हड्डी टूट सकती है जैसे कलाई, रीढ़ का निचला भाग इत्यादि।
ओस्टियोपोरोसिस से परेशानियां ?
फ्रैक्चर, खासतौर पर कमर या रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं। कूल्हे का फ्रैक्चर अधिकांशतया गिरने से होता है और यह विकलांगता के साथ-साथ कई बार मौत की भी वजह बन जाता है। रीढ़ की हड्डी का फ्रैक्चर जरूरी नहीं कि हर बार गिरने की ही वजह से हो। पीठ का दर्द और कमर से झुका जाना अन्य खतरे हैं।
ओस्टियोपोरोसिस से बचाव
अच्छे आहार और नियमित एक्सरसाइज के जरिए हम पूरी जिंदगी हड्डियों को मजबूत रख सकते हैं। हमारा वजन न तो बहुत कम और न ही बहुत ज्यादा होना चाहिए 18 से 50 वर्ष की उम्र के सामान्य व्यक्ति को प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है। महिलाओं के 50 वर्ष और पुरूषों के 70 बरस के पार जाने के बाद यह मात्रा बढ़कर 1200 मि. ग्रा. हो जाती हैं

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