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Showing posts from November, 2025

नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम Nephrotic Syndrome

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नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम यह किडनी में होनेवाली व्याधि है जो किसी भी उम्र में हो सकती है, परंतु विशेष रूप से यह बच्चों में होने वाला रोग है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम क्यों होता है ? अधिकांशतः 90% व्यक्तियों में उसका कारण ज्ञात नहीं होता है। कुछ बच्चों में आनुवांशिकता हो सकती है। कभी-कभी कुछ संक्रमण जैसे हिपेटाइटिस, HIV, मलेरिया जैसे रोगों में किडनी पर प्रभाव पड़ कर नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम हो सकता है। जितने शीघ्र इस रोग का पता चला और तुरंत ही इलाज शुरु हो गया तो इस व्याधि पर नियंत्रण भी जल्दी शुरू हो जाता है। इसलिये इस रोग के शुरुवाती लक्षण क्या होते हैं? इसकी जानकारी हम आगे देखते हैं-बच्चे के शरीर में सूजन दिखाई देती है। ये सूजन विशेष रूप से आँखों के आसपास, पैरों के पंजों में दिखाई देती है। मूत्र में झागपन दिखाई देता है। ये लक्षण दिखते ही तुरंत विशेषज्ञ के पास रूग्ण को ले जाना चाहिये। अपने आप या किसी दूसरे के बताये नुस्खे से ईलाज करने की गलती कभी न करें। अब हम यह समझते है कि नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम क्या होता है? नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम यह किडनी में होनेवाली बीमारी है। किडनी का काम है हमारे शरीर के रक्त को साफ...

ओस्टियोपोरोसिस खामोश बीमारी

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ओस्टियोपोरोसिस एक ऐसी खामोश बीमारी है, जो कि धीरे-धीरे शरीर की हड्डियों को कमजोर करने लगती है इसमें हड्डियों की मज्जा घटने लगती है और उनमें मौजूद छोटे-छोटे ऊतक फटने लगते हैं। इस प्रकार हड्डियों में फ्रैक्चर होने का खतरा लगातार बना रहता है। वैसे यह रोग अधिकतर उम्रदराज महिलाओं में पाया जाता है। हालांकि ओस्टियोरोसिस की शुरूआत जीवन में बहुत पहले ही हो जाती है, लेकिन इसके दुष्परिणाम देर से दिखते हैं। इसलिए यह सुझाया जाता है कि हमें शुरू से ही अपने आहार का ध्यान रखते हुए कैल्शियम व विटामिन डी का सेवन अधिक करना चाहिए। हड्डियों के विरल (थिनिंग) होने को ओस्टियोपोरोसिस कहते हैं हड्डियों के टिश्यू अनवरत नवीनीकृत होते रहते हैं नई हड्डियां पुरानी हड्डियों की जगह लेती रहती हैं 20 वर्ष की उम्र में बोन डेंसिटी शीर्ष पर होती है लेकिन 35 वर्ष की उम्र के बाद हड्डियों का कमजोर होना शुरू होता है। बोन डेंसिटी कई मर्तबा इतने निचले स्तर पर आ जाती है कि जरा सा गिर जाने पर हड्डियां टूट जाती हैं। शरीर का मूल स्तंभ दोष, धातु, मल है। इनमें से धातु शरीर को धारण करती है ‘‘धारणाद् धातवः’’। ये सात धातुएं है रस, रक्त, ...

चिकुन गुनिया Chikungunya

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चिकुन गुनिया होने पर बुखार तो कम हो जाता है पर उसके कारण होने वाले जोड़ो के दर्द व कमजोरी से रूग्ण कई माह तक परेशान रहते हैं। अतः चिकुन गुनिया व अन्य वायरल फीवर होने पर शुरूवात से ही  एलोपैथी  के  साथ में आयुर्वेदिक औषधि सेवन से शीघ्र लाभ होता है। इतना ही नहीं डेंगू रोग में प्लेटलेट्स कम होने पर रूग्ण परेशान रहते हैं पर आयुर्वेदिक औषधि से उन्हें चमत्कारिक लाभ मिलता है। कुछ वर्ष पूर्व हुआ कोविड महामारी का कहर आज भी लोगों के मन-मस्तिष्क में बसा है। वर्षाऋतु के आगमन के साथ अनेक रोग मनुष्य को विचलित कर रहैं हैं जैसे चिकुन गुनिया, डेंगू, वायरल फीवर, गैस्ट्रो इत्यादि। आज हर घर में कोई न कोई चिकुन गुनिया या डेंगू या वायरल बुखार से त्रस्त है ही। सभी के लिए यह चिंता का विषय है कि इससे कैसे बचा जाए या रोग होने पर उसका उपचार कैसे करें ?  चिकुनगुनिया मच्छरों के काटने से फैलने वाली वायरल बीमारी है।  यह बीमारी बुखार, जोड़ों में दर्द और सूजन के साथ प्रकट होती है। चिकुनगुनिया वायरस CHIK V (चिक वी) एडिस एजिप्टी मच्छरों के काटने से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। यह मच्छर पहले स...

लाभकारी वनौषधियाँ Beneficial Herbs

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संधिवात की चिकित्सा में ऐसी औषधियों की आवश्यकता होती है, जो सुरक्षित और अधिक समय तक प्रभावी हों। ऐसी बहुत सी वनौषधियां उपलब्ध हैं, जो इस रोग में लाभदायक हैं। संधिवात की चिकित्सा में वातहर वेदनास्थापक (दर्द दूर करने वाली), शोथनाशक (सूजन नष्ट करने वाली) औषधियों की आवश्यकता होती है, जो दर्द व सूजन में आराम दें तथा रोग को बढ़ने से रोकें। ऐसी कुछ वातशामक वनौषधियों का वर्णन यहां किया जा रहा है। हड़जोड (Cissus quadraangularis) इसका संस्कृत नाम अस्थिश्रृंखला है। सामान्य भाषा में इसे हड़जोड़ कहते है। औषधि रूप में इसके काण्ड का स्वरस 10-20ml तक प्रयोग कर सकते हैं। आयुर्वेद में इसे अस्थिसंधानीय कहा गया है अर्थात् यह हड्डी को जोड़ने में सहायक है। अतः फ्रैक्चर तथा मोंच में इसका प्रयोग करते हैं। कुछ आयुर्वेद ग्रंथों में इसे वृष्या, बलप्रदा तथा वातनाशक भी कहा है। भावप्रकाश निघण्टु में इसके टुकड़ों के छिलके उतार उसमें छिलकारहित उड़द की दाल आधी मात्रा में मिलाकर पीसने के बाद टिकिया बनाकर तिल तेल में पकाते हैं। यह टिकिया वात में हरण करती है। अतः यह संधिवात में उपयोगी हो सकती है। बला (Sida cordifolia) इसे साम...

कार्पेल टनल सिन्ड्रोम Carpal Tunnel Syndrome

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जिन व्यक्तियों के हाथ में सुन्नता, झुनझुनी आती है, हाथ में दर्द होता है, कमजोरी आती है, उन्हें अपने डॉक्टर से परीक्षण कराना चाहिए क्योकि हो सकता है कि वे कार्पेल टनल सिन्ड्रोम नाम की व्याधि से ग्रस्त हो। ये कार्पेल टनल सिन्ड्रोम होता क्या है? आइये इसके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। कार्पेल याने कलाई। हमारी आठ छोटी हड्डियों से निर्मित होती हैं, जो हाथ को अग्रभाग से जोड़ती हैं। कार्पेल टनल सिन्ड्रोम तब होता है, जब टनल सँकरी हो जाती है,जिससे मिडियन नर्व पर दबाव पड़ता है फलस्वरूप हाथ में सुन्नता, झुनझुनी, दर्द, कमजोरी होने लगती है। मिडियन नर्व अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के हिस्से में संवेदना को नियंत्रित करती है अतः लक्षण भी न्यून-अधिक रूप में यहीं पर ज्यादा अनुभव में आते हैं। पुरूषों की तुलना में कार्पेल टनल सिन्ड्रोम महिलाओें में अधिक मिलता है और विशेष रूप से 40-60 वर्ष के आयु में अधिक पाया जाता है। स्थूल व्यक्तियों में भी इस व्याधि का खतरा बढ़ जाता है। कभी-कभी गर्भावस्था के दौरान भी यह समस्या हो सकती है और बच्चे के जन्म के पश्चात ठीक हो जाती है। अधिक समय तक अधिक दबाव के चलते कभी-...

सन्धिवात Arthritis

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आजकल अधिकांश लोग जोड़ों के दर्द से परेशान रहते हैं, जिसके कारण उन्हें चलने, फिरने, उठने-बैठने, रोजमर्रा के कार्य करने में अत्यन्त कष्ट का अनुभव होता है। हमारे शरीर में हड्डियों के जोड़ या सन्धियां चलने, फिरने, उठने बैठने आदि सभी क्रियाकलापों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जब किसी कारण इन जोड़ों में विकार उत्पन्न हो जाता है, तो मनुष्य अपने दैनिक कार्यों को भी करने में परेशानी का अनुभव करता है। वर्तमान में जोड़ों की व्याधियां प्रौढ़, वृद्धों एवं युवाओं को प्रभावित कर रही है। आयुर्वेद में अस्सी प्रकार की वातव्याधियां बतायी गयी हैं जिनमें सभी जोड़ों की व्याधियां भी सम्मिलित हैं। जोड़ों की व्याधियों को लोग अधिकतर गठिया या बॉय के नाम से पुकारते हैं। जिसको सामान्यतः आर्थराइटिस कहते है। जोड़ों की व्याधियों के अन्तर्गत भी अनेक रोग हैं जैसे संधिवात, आमवात एवं वातरक्त जो कि प्रमुख रूप से होते हैं, लेकिन रोगी को इनमें अन्तर न समझ में आने से वह इन्हें गठिया या बाय ही समझता है। अतः इन तीनों जोड़ों की व्याधियों के बारे में अन्तर जानना जरूरी है। संधिवात प्रायः प्रौढ या वृद्धावस्था में अधिकतर पायी जानेवाली व्याध...